अमेरिका में क्रिप्टोकरेंसी के लिए व्यापक कानून बनाने की कोशिश ने भारत में डिजिटल परिसंपत्तियों के नियमन को लेकर बहस फिर तेज कर दी है। अमेरिकी सीनेट में प्रस्तावित CLARITY Act को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया सितंबर तक टल गई है, लेकिन यह विधेयक इस बात का उदाहरण है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं क्रिप्टो बाजार के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। दूसरी ओर भारत में क्रिप्टो पर कर और धन शोधन रोकथाम से जुड़े नियम लागू हैं, लेकिन कारोबार, निवेशक सुरक्षा और बाजार संचालन के लिए अब भी कोई व्यापक कानून नहीं है।
भारत की संसदीय वित्त समिति ने हाल में इस स्थिति को देखते हुए व्यापक कानून बनने तक एक अंतरिम व्यवस्था की सिफारिश की है। इसके तहत मान्यता प्राप्त स्व-नियामक संगठनों को एक निर्धारित नियामक की निगरानी में काम करने का सुझाव दिया गया है।
अमेरिका में क्या है CLARITY Act?
अमेरिका का CLARITY Act डिजिटल परिसंपत्तियों के लिए स्पष्ट नियम तय करने की कोशिश है। इसका एक प्रमुख उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि अलग-अलग डिजिटल टोकन कब प्रतिभूति माने जाएंगे और कब उन्हें वस्तु के रूप में देखा जाएगा। इसके साथ ही अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग तथा कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन के अधिकार क्षेत्र को भी अधिक स्पष्ट करने की योजना है।
विधेयक को अमेरिकी क्रिप्टो उद्योग लंबे समय से कानूनी स्पष्टता के लिए महत्वपूर्ण मानता रहा है। उद्योग का तर्क है कि स्पष्ट नियम होने से कंपनियों को कारोबार की दिशा तय करने में आसानी होगी और बड़े संस्थागत निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है।
हालांकि विधेयक की राह आसान नहीं है। सीनेट में इसे आगे बढ़ाने के लिए 60 वोटों की जरूरत है और कई डेमोक्रेट सांसद इसके मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जता रहे हैं। मनी लॉन्ड्रिंग रोकने, सरकारी अधिकारियों के क्रिप्टो कारोबार और निवेशकों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को लेकर भी मतभेद हैं। सितंबर 15 को होने वाला प्रक्रियात्मक मतदान विधेयक के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत में क्या है स्थिति?
भारत में क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है, लेकिन सरकार इसे कर व्यवस्था और धन शोधन रोकथाम नियमों के दायरे में ला चुकी है। क्रिप्टो से होने वाले लाभ पर कर लागू है और संबंधित संस्थाओं को धन शोधन रोकथाम कानून के तहत रिपोर्टिंग और ग्राहक पहचान जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है।
समस्या यह है कि इन उपायों के बावजूद क्रिप्टो के जारी करने, कारोबार, मध्यस्थों, बाजार संचालन और निवेशक सुरक्षा के लिए कोई एक व्यापक कानूनी ढांचा नहीं है। संसदीय समिति ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति निवेशकों को धोखाधड़ी, बाजार में हेरफेर, गलत जानकारी और कमजोर शिकायत निवारण जैसे जोखिमों के सामने छोड़ सकती है।
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भारतीय रिजर्व बैंक का रुख भी सावधान रहा है। जुलाई में संसदीय समिति के सामने RBI ने कहा था कि वह वर्चुअल डिजिटल परिसंपत्तियों को मुद्रा के रूप में मान्यता देने के पक्ष में नहीं है। प्रतिभूति के रूप में उनके संभावित वर्गीकरण पर भी केंद्रीय बैंक ने तत्काल स्पष्ट जवाब नहीं दिया था।
अंतरिम स्व-नियमन से क्या बदलेगा?
भारत की संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि जब तक पूरा कानून नहीं बनता, तब तक मान्यता प्राप्त स्व-नियामक संगठन बनाए जाएं। इन संगठनों के लिए शासन, पारदर्शिता, जानकारी सार्वजनिक करने, निवेशक सुरक्षा, शिकायत निवारण और नियमों के पालन के न्यूनतम मानक तय किए जा सकते हैं। इनकी निगरानी एक निर्धारित सरकारी नियामक के तहत करने का प्रस्ताव है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य उद्योग को पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ने और तत्काल व्यापक कानून बनाने के बीच एक रास्ता तैयार करना है। हालांकि यह स्थायी समाधान नहीं होगा। स्व-नियमन से बाजार में कुछ सामान्य मानक आ सकते हैं, लेकिन अधिकारों, जिम्मेदारियों और नियामकीय सीमाओं को स्पष्ट करने के लिए अंततः कानून की जरूरत बनी रहेगी।
भारत के लिए अमेरिका से क्या सबक?
अमेरिका का अनुभव दिखाता है कि व्यापक क्रिप्टो कानून बनाना आसान नहीं है। वहां भी नियामक अधिकार, निवेशक सुरक्षा, बैंकिंग क्षेत्र और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मुद्दों पर राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। फिर भी स्पष्ट नियमों को लेकर चर्चा आगे बढ़ रही है।
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह क्रिप्टो को पूरी तरह वित्तीय व्यवस्था से बाहर रखे या जोखिम के आधार पर अलग-अलग डिजिटल परिसंपत्तियों के लिए अलग नियम बनाए। संसदीय समिति की सिफारिशें संकेत देती हैं कि नीति चर्चा अब पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित हो रही है।
फिलहाल भारत व्यापक क्रिप्टो कानून की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। अमेरिका में CLARITY Act की प्रक्रिया चाहे सितंबर में आगे बढ़े या फिर राजनीतिक मतभेदों में फंस जाए, इस बहस ने भारत के सामने एक बात स्पष्ट कर दी है। क्रिप्टो बाजार को केवल कर और निगरानी के जरिए लंबे समय तक चलाना मुश्किल होगा। आने वाले समय में निवेशक सुरक्षा, बाजार पारदर्शिता और नवाचार के बीच संतुलन बनाने वाला स्पष्ट नियामकीय ढांचा भारत की बड़ी जरूरत बन सकता है।
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